#उत्तराखण्ड

मूल निवास: हालिया आदेश एक झुनझुना मात्र

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अनिल बहुगुणा अनिल ( प्रधान संपादक), हिम् तुंग वाणी

20 दिसंबर का आदेश मात्र 24 की रैली के परिपेक्ष्य में
■ एक मात्र लाभ: सिर्फ मूल निवास प्रमाण पत्र धारी व्यक्ति बचेंगे प्रमाण पत्र बनाने की फजीहत से
■ संसाधन, सुविधा व नौकरियों में मूल निवासियों के अधिकारों का सवाल अभी भी जस का तस
■हैरानी की बात: रेवेन्यू डिपार्टमेंट के पोर्टल में अब मूल निवास शब्द ही गायब
■असल सवाल: स्थाई निवास सर्टिफिकेट जारी ही क्यों हो

शीतकालीन राजधानी देहरादून के परेड ग्राउंड में मूल निवास व भूमि कानून को लेकर आगामी 24 दिसम्बर को आहूत रैली को देखते हुए सरकार ने बुधवार को आनन फानन में एक आदेश जारी किया। आदेश का एक मात्र लब्बोलुआब यह है कि जिन उत्तराखंडियों के पास वर्तमान में मूल निवास प्रमाण पत्र है उन्हें अब स्थाई निवास प्रमाण पत्र बनाने की जरूरत नहीं होगी। इस आदेश का इससे अधिक कोई औचित्य नजर नहीं आता। जबकि असल मुद्दा यह है कि जिस राज्य की मांग व गठन सिर्फ इस मांग को लेकर हुआ है कि इस प्रदेश के संसाधनों, सुविधाओं व सरकारी नौकरियों में सिर्फ और सिर्फ यहाँ के मूल निवासियों का हो।
यदि हम राष्ट्रीय स्तर पर एक नजर डालें तो देखने में आता है कि हिमांचल व मध्य प्रदेश जैसे सूबों में कम से कम तृतीय श्रेणी तक की सरकारी सेवाओं में सिर्फ़ और सिर्फ वहाँ के मूल निवासियों का हक है। सिक्किम व गुजरात जैसे राज्यों में जहाँ मूल निवासियों में सरकारी नौकरियों के प्रति अधिक रुचि नहीं है, वहां मूल निवास को लेकर कुछ फ्लेक्सिबिलिटी नजर आती है।
इधर, उत्तराखंड राज्य की तरफ ध्यान दें तो साफ नजर आता है कि इस राज्य के गठन के लिए शुरू हुए आंदोलन का जन्म आरक्षण विरोधी आंदोलन की कोख से ही हुआ था। ज़ाहिर है, तत्कालीन अविभाजित उप्र राज्य में सरकारी नौकरियों में पर्वतीय बेरोजगारों को पर्याप्त अवसर न मिल पाने के कारण यह आंदोलन उग्र हुआ। लेकिन पृथक राज्य गठन के बाद बनी तमाम सरकारों द्वारा दबे पांव ऐसे आदेश जारी किए गए, जिनके फलस्वरूप मूल पहाड़ियों के बर्चस्व को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया। यहाँ तक कि पृथक उत्तराखंड को उत्तर प्रदेश की फोटोकॉपी बना दिया गया। यही नहीं तृतीय श्रेणी ही नहीं बल्कि चतुर्थ श्रेणी व आउटसोर्स के जरिये सरकारी नौकरियों के दरवाजे बाहरी लोगों के लिए खोल दिये गए।
दरअसल, सरकारों द्वारा रेवेन्यू पोर्टल से मूल निवास शब्द को ही डिलीट कर दिया गया और स्थायी निवास को ही सरकारी सुविधा, नौकरी व संसाधनों का आधार बना दिया गया।

●मूल निवासियों को झेलनी पड़ी ज्यादा दिक्कत●
रेवेन्यू पोर्टल से मूल निवास शब्द डिलीट करने के बाद मूल निवास प्रमाण पत्र धारी लोगों को स्थायी निवास सर्टिफिकेट बनाने की बाध्यता के चलते उन्हें दस्तावेजों में सुधार के लिए एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा, जबकि बाहरी प्रदेशों से आये लोगों को आसानी से स्थाई निवास प्रमाण पत्र जारी हो गए। ‘अपनो पर सितम, गैरों पर करम” के सरकारों की इस फ़ितरत का नतीजा यह हुआ कि न केवल पूर्णकालिक सरकारी नौकरी बल्कि आउटसोर्स जैसी नौकरियों में भी बाहरी लोगों का कब्ज़ा हो गया।

◆स्थाई निवास शब्द को ही हटाया जाना जरूरी◆

आदेश की प्रति पृष्ठ

उत्तराखंड जैसे सीमित संसाधनों वाले सूबे में स्थायी निवास जैसे शब्द को हटाया जाना जरूरी है। अन्यथा सरकारी नौकरी व संसाधनों पर बाहरी लोगों के अतिक्रमण को नहीं रोका जा सकता। मूल निवास की एक ठोस परिभाषा तय कर सरकारी सिस्टम में सिर्फ और सिर्फ डोमेसाइल शब्द को शामिल करना जरूरी है।

आज भले ही सरकार द्वारा आनन फानन में एक आदेश जारी कर आगामी 24 तारीख को होने वाली रैली में प्रतिभाग करने का इरादा रखने वाले लोगों के आक्रोश को कम करने की कोशिश की गई हो, लेकिन दो पैराग्राफ वाले इस फ़रमान में ऐसा कुछ नहीं है कि जिससे ऐसा प्रतिमा होता हो कि सरकार पहाड़ी जनभावनाओं व मांगों को गंभीरता से पूरा करने की तरफ बढ़ रही हो, फ़िलहाल यह एक झुनझुना मात्र है।

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