#उत्तराखण्ड

भगत दा की चुटकी से उत्तराखंड की सियासत में तरह तरह की चर्चाएं

Share Now

★गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी के बारे में भगत दा के बयान के कई मायने★ ★उत्तरखण्ड की राजनीति का माहौल गर्म●

*अनिल बहुगुणा*

भगत सिंह कोश्यारी के एक भाषण में गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी पर ली गई एक ‘चुटकी’ ने उत्तराखण्ड के सियासी तापमान को बढ़ा दिया है। वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री-पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी द्वारा गढ़वाल लोकसभा सांसद अनिल बलूनी पर की गई टिप्पणी ने उत्तराखंड भाजपा की अंदरूनी राजनीति को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। सार्वजनिक मंच पर गढ़वाल संसदीय क्षेत्र में की गई कोश्यारी की इस टिप्पणी को राजनीतिक गलियारों में “व्यंग्यात्मक चुटकी” के रूप में देखा जा रहा है। महाराष्ट्र के राज्यपाल का पद छोड़ने के बाद सक्रिय राजनीति के बज़ाय पढ़ने में समय बिताने की बात करने वाले कोश्यारी का अचानक मुखर होना सामान्य राजनीतिक बयान से कहीं ज्यादा माना जा रहा है।
राजनीतिक के जानकार इस बयान को हल्का मान कर नहीं चल रहे है। इस बयान को गढ़वाल-कुमाऊं के पारंपरिक संतुलन, संगठनात्मक नियंत्रण और 2027 के विधानसभा चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है। अनिल बलूनी, जो केंद्र में भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी के रूप में सक्रिय हैं और विभिन्न केंद्रीय योजनाओं के प्रचार-प्रसार में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं, गढ़वाल क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत रखे हुये है। अपनी लोकसभा में स्थाई विकास को ले कर वे बड़े संजीदा है।
ये अंदाजा है कि “कोश्यारी जैसे दिग्गज का इस स्तर पर बयान देना संकेत देता है कि पार्टी के भीतर नए समीकरण बन रहे हैं। यह व्यक्तिगत नहीं, बल्कि क्षेत्रीय और संगठनात्मक संतुलन की राजनीति है।अभी तक भाजपा की आधिकारिक स्तर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद चर्चाएं तेज हो गई हैं। कुछ कार्यकर्ता इसे “वरिष्ठ बनाम उभरते नेतृत्व” की टक्कर के रूप में भी देख रहे हैं। कई मामलों में रिजर्व रहने वाले अनिल बलूनी पर इस बयान के बाद से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी तक सामने नहीं आई है। वे लगातार केंद्र और राज्य के विकास कार्यों, खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर और पर्यटन से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं। जानकारी ये भी है कि ये बयान दिल्ली आलाकमान तक भी पहुँचा दिया गया है। यह बयान उत्तराखंड भाजपा में आगामी रणनीतियों और नेतृत्व चयन को लेकर चल रही हलचलों को और बढ़ावा देती दिख रही है। पार्टी सूत्र इस पर बात करने से बच रहे है, लेकिन ऐसे बयान आंतरिक चर्चा का हिस्सा हैं। इन्हें 2027 के चुनावी मैदान में क्षेत्रीय समीकरणों के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *