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माननीयों का सुबोध पर प्रहार: कहीं आंतरिक सियासत का खेल तो नहीं..?

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■चंद दिनों में अपनी ही पार्टी के दो एमएलए के साथ विवाद में रहे सुबोध

■ आक्रामक कार्यशैली वाले मंत्री हैं उनियाल

■आपने महकमें में किसी भी तरह की दखलंदाजी मंजूर नहीं होती वन मंत्री को

हिम् तुंग वाणी

अभी कुछ दिन पूर्व ही भीमताल से भाजपा विधायक राम सिंह कैड़ा का एक फोन कॉल वायरल हुआ, जिसमें तथाकथित तौर पर कैड़ा अपने क्षेत्र में आदमखोर बाघ के हमलों के बाबत वन मंत्री सुबोध उनियाल से वार्ता कर रहे थे। बताया जा रहा है कि इस वार्ता के दौरान तथाकथित तौर पर वन मंत्री ने माननीय न्यायालय के कुछ फैसलों पर भी टिप्पणी की। वहीं गत दिवस तो पुरोला के विधायक दुर्गेश्वर लाल तो वन मंत्री सुबोध उनियाल के सरकारी आवास के बाहर धरने पर ही बैठ गए।
दुर्गेश्वर लाल चाहते हैं कि उनके क्षेत्र में तैनात डीएफओ दम्पति लगातार विकास कार्यों में रोड़ा लगाते जा रहे हैं। ऐसे में उनके द्वारा वन मंत्री से इन डीएफओ का तबादला करने की गुजारिश की गई। किन्तु जब ट्रांसफर नहीं हुआ तो वह स्वयं समर्थकों के साथ वन मंत्री से मिलने उनके आवास पर पंहुचे, दुर्गेश्वर जोड़ते हैं कि इस दौरान वन मंत्री ने उनसे अभद्र व्यवहार किया और बाहर निकलने को कह दिया। इससे नाराज होकर उन्हें मजबूरन मंत्री के आवास के बाहर धरना देना पड़ा। हालांकि सुबोध उनियाल दुर्गेश्वर के आरोपों को सरासर बेबुनियाद करार देते हुए पलटवार करते हैं कि आईएफएस अधिकारी के तबादले की एक निश्चित प्रक्रिया होती है जिसके लिए हॉफ की जांच अनिवार्य है। उन्होंने जब जांच हेतु पत्र हॉफ को दिया तो दुर्गेश्वर लाल ने उस पत्र को ही फाड़ डाला। हालांकि बाद में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र प्रसाद भट्ट ने दुर्गेश्वर लाल को तलब कर अनुशासन में रहने की नसीहत भी दी।
हालांकि, सप्ताह के भीतर ही सत्ताधारी दल के दो विधायकों द्वारा वन मंत्री सुबोध उनियाल को घेरने की घटना महज एक इत्तेफाक भी हो सकता है लेकिन दबंग व बिंदास बोल वाले मंत्री सुबोध के साथ घटित हो रही इन घटनाओं के तार भाजपा की आंतरिक सियासत से भी जुड़े हो सकते हैं। कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए सुबोध उनियाल 2017 से 2022 तक भी प्रदेश मन्त्रिमण्डल में शामिल रहे। माना जाता है कि सुबोध उनियाल पर लगाम कसना तकरीबन नामुमकिन है। वह न केवल अपने मंत्रिमंडल के साथियों बल्कि मुख्यमंत्री पर भी बेहिचक टिप्पणी करने से नहीं हिचकते। जितने भी मुख्यमंत्री बीते 7 साल में हुए, सभी के साथ सुबोध के भले खुले तौर पर ज्यादा मतभेद न रहे हों, लेकिन वह किसी भी मुख्यमंत्री के कहने सुनने में रहने वाले बजीर भी कभी नहीं रहे। आक्रामक प्रवृत्ति वाले सुबोध उनियाल आजादी से काम करने के आदी हैं। वर्तमान में भी सुबोध की कार्यशैली पूर्व की भांति ही है, अपने महकमों व उसके अफसरान से लेकर कारिंदों तक को वह अपनी ही चिरपरिचित शैली से हांकने के आदी रहे हैं। भाजपा की कार्यशैली व सुबोध का काम करने का तरीका कुछ मायनों में निश्चित रूप से जुदा है।
बहरहाल, देखना है कि मुख्यमंत्री धामी अपनी पार्टी के माननीयों को किस तरह से संतुष्ट करते हैं, वहीं वरिष्ठ व कद्दावर मंत्री सुबोध उनियाल को ऐसे विवादों से बचने हेतु कैसे राजी करते हैं।

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