द्रोण नगरी में भाजपा की ‘कोर क्लास’: क्या बदलेंगे सियासी समीकरण
अनिल बहुगुणा
देहरादून
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के तीन दिवसीय उत्तराखंड दौरे और प्रदेश कोर कमेटी की बैठक ने राज्य के सियासी पारे को गरमा दिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बी.एल. संतोष की मौजूदगी में हुई इस बैठक को जहां भाजपा आने वाले चुनावों के लिए ‘चुनावी शंखनाद’ और संगठन की मजबूती बता रही है, वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे भाजपा की अंदरूनी घबराहट और सरकार की विफलताओं का नतीजा करार दिया है।
इस हाई-प्रोफाइल बैठक के बाद राज्य के राजनीतिक गलियारों में नए समीकरणों को लेकर बहस छिड़ गई है। राष्ट्रीय अध्यक्ष के सामने प्रदेश के बड़े नेताओं की गुटबाजी को लेकर नितिन नवीन काफ़ी असहज भी रहे। हालांकि मुख्यमंत्री ने अध्यक्ष के आने से पहले ही डिनर डिप्लोमेसी से मामलों को डईलूट करने की कोशिश की थी लेकिन वे कितना सफ़ल हो पाए ये पता नहीं है।
भाजपा सूत्रों की माने तो, कोर कमेटी की बैठक का मुख्य एजेंडा आगामी विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों की रूप रेखा तैयार करना है। बताया जा रहा है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष ने विधायकों, सांसदों और मंत्रियों के कामकाज का ‘प्रोग्रेस कार्ड’ देखा और साफ संकेत दिए कि संगठन में किसी भी स्तर पर ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
बैठक में भाजपा और राज्य सरकार विरोधी मनो से निपटने के लिए भाजपा इस बार कड़े फैसले लेने का भी निर्णय किया गया है,ऐसा बताया जा रहा है। बैठक में साफ किया गया कि आगामी चुनावों में केवल उन्हीं चेहरों को तवज्जो मिलेगी जिनकी जनता के बीच मजबूत पकड़ होगी, जिससे कई पुराने दिग्गजों के टिकट पर तलवार लटक सकती है।
दिल्ली से आए शीर्ष नेताओं ने साफ किया कि मंत्रियों और विधायकों को अब अपने क्षेत्रों में ज्यादा समय बिताना होगा ताकि सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को बूथ स्तर तक पहुंचाया जा सके।
कांग्रेस भाजपा की इस बैठक का आकलन अपने अनुसार ही कर रही है। कांग्रेस का कहना है कि जनता के गुस्से से घबराकर यह आपात बैठक बुलाई गई है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने भाजपा के इस पूरे दौरे और कोर कमेटी की बैठक पर बेहद आक्रामक रुख अपनाया है। कांग्रेस प्रदेश नेतृत्व का कहना है कि यह दौरा संगठन को मजबूत करने के लिए नहीं, बल्कि राज्य सरकार की विफलताओं को छिपाने के लिए किया गया है। पार्टी का कहना है कि भाजपा मूल मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि राज्य में बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था (अंकिता भंडारी मामला,हत्या के मामले) के मोर्चे पर धामी सरकार पूरी तरह बैकफुट पर है। विपक्ष के अनुसार, दिल्ली के नेताओं को यहां आकर ‘क्लास’ इसलिए लेनी पड़ रही है क्योंकि स्थानीय नेतृत्व जनता का विश्वास खो चुका है।
कांग्रेस ने ये भी तंज कसते हुए कहा कि मंत्रियों की खिंचाई और सांगठनिक फेरबदल की चर्चाएं खुद इस बात का प्रमाण हैं कि भाजपा के अंदरखाने भारी गुटबाजी और असंतोष का माहौल है।
राजनीतिक पंडितों की मानें तो इस बैठक के दोनों पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एक तरफ जहां भाजपा अपनी चिर-परिचित कार्यशैली के तहत चुनाव से काफी पहले ही संगठन को ‘एक्शन मोड’ में लाकर अपनी कमियों को दूर करने में जुट गई है, वहीं विपक्ष का यह दावा भी राजनीतिक रूप से सही है कि जनता के बीच कुछ मुद्दों को लेकर असंतोष जरूर है, जिसे भांपते हुए ही भाजपा आलाकमान को खुद कमान संभालनी पड़ी है।
अब दिलचस्प ये होगा कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के इस दौरे के बाद धामी सरकार और संगठन में क्या बड़े बदलाव देखने को मिलते हैं,और कांग्रेस भाजपा की इस घेराबंदी का जमीन पर कितना मुकाबला कर पाती है।





