अदावत की आग ने हेमवती नंदन को बना दिया चंदन, आलेख:प्रमोद शाह
“प्रमोद शाह”
●अदावत की आग ने , उन्हें चंदन बना दिया…,
हिमालय के नंदन को,हेमवती नंदन बना दिया..।●
हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तराखंड के उन चुनिंदा, राजनीतिज्ञों में एक थे , जिन्होंने अपने फलक का शीघ्र ही राष्ट्रीय विस्तार किया, और सत्ता के गुलाबी सिंहासन में बैठकर भी हिमालय के नुकीलेपन को लगातार बनाए रखा,अदावत के इस स्वभाव ने हीं ,हेमवती नंदन बहुगुणा को राजनीति का आजत शत्रु बना दिया ।

25 अप्रैल 1919 को पौड़ी में जन्म लेने वाले हेमवती नंदन बहुगुणा छात्र जीवन में इलाहाबाद रहने के दौरान जवाहरलाल नेहरू सहित पहली पंक्ति के कांग्रेसियों के सम्पर्क में आ गए.
वह अपनी प्रतिभा और नाफरमानी के स्वभाव से लगातार ध्यान खींचते रहे , और स्वतंत्रता के आंदोलन में 1942 में लंबे समय तक जेल भी गए।
1952 में जब राजकुमारी अमृत कौर हिमाचल की मंडी लोकसभा से चुनाव लड़ रही थी ।तो पर्वतीय क्षेत्र में समर्पित कार्यकर्ता और सलाहकार के रूप में जवाहरलाल नेहरू ने हेमंती नंदन बहुगुणा को मंडी भेज दिया..। यहां से हेमवती नंदन बहुगुणा का राजनीतिक सफर तेजी से शुरू हुआ और राष्ट्रीय राजनीति में उनका विस्तार हुआ।
लेकिन बगावत उनके स्वभाव में थी .19 71 में पहले केन्द्रीय संचार मंत्री फिर 1974 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने हेमवतीनंदन बहुगुणा को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े सूबे का मुख्यमंत्री बना दिया ।
लेकिन अदावत उनके स्वभाव में थी । उन्होंने उत्तर प्रदेश में इंदिरा गांधी के हस्तक्षेप को यह कहकर ठुकरा दिया कि
“बैक सीट ड्राइविंग’ संभव नहीं है. इतने बड़े प्रदेश को चलाने वाले मुख्यमंत्री को अपना फ़ैसला ख़ुद लेना होगा. मैंने उनसे साफ़ कहा कि मेरे कंधे पर आपका सिर नहीं हो सकता।””
इंदिरा गांधी तिलमिला गई ,बहुगुणा को हटाने के बहाने ढूंढने लगी उनके विरुद्ध हस्ताक्षर कैंपेन चलाया गया।
इंदिरा गांधी ने 27 नवंबर 1975 को उन्हें दिल्ली बुलाया और कहा, ‘बहुगुणा जी लोग आपसे नाखुश हैं। पूरी पार्टी आपके साथ नहीं है।’ बहुगुणा सुनते रहे और फिर बोले, ‘आप अच्छे लोगों को कांग्रेस से हटा रही हैं। यह पार्टी के हित में नहीं है।’ इंदिरा गांधी कुछ नहीं बोलीं। बहुगुणा को 28 नवंबर को मुख्य सेंसर ने बताया, ‘आप पर सेंसर लगा दिया गया है। आपका कोई बयान बिना सेंसर समाचार पत्रों में नहीं छपेगा।’
बहुगुणा समझ गए की आगे अब लोकतंत्र के लिए लड़ना जरूरी है।
लखनऊ वापस आकर ,सीधे राजभवन पहुंचकर मुख्यमंत्री मंत्री पद से अपना इस्तीफा दे दिया ।
1980 में भी केंद्रीय मंत्री के रूप में इंदिरा गांधी से फिर टकराहट हुई .. इस्तीफा दिया और 1982 में गढ़वाल लोकसभा सीट से बतौर निर्दलीय प्रत्याशी इंदिरा गांधी की निरंकुश सत्ता को पटकनी दे दी..।
स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा की शख्सियत बगावत की थी । वह गुणीऔर विद्वान भी थे . उनके द्वारा उत्तर प्रदेश में स्थापित पर्वती विकास परिषद, जिसने कालांतर में एक मंत्रालय का स्वरूप ग्रहण किया ने दुर्गम पार्वती राज्य के हित में जो बड़े फैसले किए वह हम 25 वर्षों के उत्तराखंड में अभी तक भी नहीं देख पा रहे हैं।
वे उत्तराखंड के संघर्षशील लोगों को पहचानते थे उनका सम्मान करते थे , अपनी विद्वता और प्रतिभा से ब्यूरोक्रेट्स को दबा कर भी रखते थे , और राजनीति में कभी भी ब्यूरोक्रेट्स की कठपुतली बनते नजर नहीं आए वह जानते थे ब्यूरोक्रेट्स का नजरिया जनता से उत्तरपोल जैसा होता है।
वह जानते थे चाटुकारिता से आप कुर्सी में बने रह सकते हैं। इतिहास में जगह दर्ज करने के लिए आपको साहस पूर्वक सत्य के साथ खड़ा होना होता है।
आज उनकी जयन्ती है , नई पीढ़ी के नेता उनके साहस के पक्ष को देखें और प्रदेश के हित में खड़े होने का साहस पैदा करें ।
(लेखक उत्तराखंड में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हैं)




