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पौड़ी लोस: क्षेत्रवाद व जातिवाद की कोई गुंजाइश नहीं, मुकाबला होगा रोचक

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अजय रावत अजेय

1952 में गठित 02-गढ़वाल संसदीय क्षेत्र में 2024 के महासंग्राम में क्षेत्रवाद व जातिवाद सरीखे प्रपंच रचे जाने की कोई गुंजाइश नहीं है। दोनों प्रमुख दलों के उम्मीदवार गढ़वाल जनपद के ही मूल निवासी हैं, वहीं दोनों ब्राह्मण वर्ग से आते हैं। अब चुनाव की दिशा दोनों दलों की छवि व संगठन की मजबूती एवम दोनों प्रत्याशियों की व्यक्तिगत खूबियों से ही तय होगी। मतदान की तिथि तक हवाओं का रुख किस दिशा की ओर होगा, यह भविष्य के गर्त में छुपा हुआ है लेकिन फ़िलवक्त तक पब्लिक डोमेन में दोनों प्रत्याशियों की चर्चा समांतर रूप से हो रही है।

●तीन दशक से भाजपा का लगभग अभेद्य किला रहा है गढ़वाल●

1996 व 2009 के दो चुनावों को छोड़ दिया जाए, तो हर चुनाव में भाजपा ही इस सीट पर काबिज रही। इन दो चुनावों में जिनमें सतपाल महाराज ने एक मर्तबा बतौर तिवारी कांग्रेस और एक बार आईएनसी के प्रत्याशी के रूप में भाजपा को मात दी। 2019 में भाजपा के तीरथ रावत ने 68 फ़ीसद मत पाकर कांग्रेस के मनीष खंडूरी को 3 लाख से अधिक मतों से परास्त किया था। 2014 में जनरल खंडूरी ने भी 60 प्रतिशत मत हासिल कर कांग्रेस के हरक रावत को 1 लाख 85 हजार वोटों से पछाड़ दिया था। वहीं 2009 में कांग्रेस के सतपाल महाराज ने भाजपा के जनरल टीपीएस रावत को मात्र 17 हज़ार वोट से हराया। इन आंकड़ों से साफ है कि गढ़वाल संसदीय क्षेत्र भाजपा का अभेद्य किला रहा है।

■इस मर्तबा क्षेत्रवाद व जातिवाद की कोई गुंजाइश नहीं■

1982 के चर्चित उपचुनाव के दौरान इंदिरा गांधी ने इस सीट को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ दिया था, नतीजतन कांग्रेस द्वारा चुनाव जीतने के लिए हर तरह के प्रपंच रहे गए, जिसमें धन-बल के साथ जातिवाद भी प्रमुख था। हालांकि नतीजों पर इसका कोई खास फर्क नहीं पड़ा और बहुगणा निर्वाचित हो गए। किन्तु चुनावों में जाति वार मतदाताओं की संख्या को एक इलेक्टोरल टूल की तरह देखा जा रहा है, ऐसे में इसे भी एक फैक्टर माना जाता है। जिसकी इस चुनाव में गढ़वाल लोकसभा में कोई अहमियत नहीं रह गयी है। वहीं दोनों प्रत्याशियों के गढ़वाल जिले से होने के चलते जिलावार क्षेत्रवाद की संभावनाएं भी खत्म हो गयी हैं।

■गणेश गोदियाल: सहज जन-संवाद सबसे बड़ी ताकत■

कांग्रेस प्रत्याशी गणेश गोदियाल की सादगी व जनता के मध्य सहज संवाद उनकी सबसे बड़ी ताकत है। बीते 2 दशक से पहाड़ में उनकी अनवरत उपस्थिति उन्हें इस पैमाने पर विरोधी प्रत्याशी से बीस साबित करती है। आम ग्रामीणों के मध्य उनके सुख दुख में शामिल होना, अपनी बोली में संवाद करने जैसी खूबियां उन्हें लोकप्रिय बनाती हैं। चर्चित अंकिता हत्याकांड में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग पर भी वह काफी मुखर रहे हैं।
गोदियाल का कमजोर पक्ष कांग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय स्तर पर गिरती साख, लचर व खण्डित हो चुका संगठन एवम संसाधनों की कमी है। कांग्रेस संगठन पूरी तरह से खत्म हो चुका है। तमाम छोटे बड़े नेता सत्ताधारी दल के पीछे हो लिए हैं। पूरी लोकसभा क्षेत्र में पार्टी के एकमात्र विधायक राजेन्द्र भंडारी भी भगवा ध्वज थाम चुके हैं। तमाम जिपं अध्यक्ष, प्रमुख भी भाजपाई हो गए हैं। ज़ाहिर है ऐसे में ग्राम स्तर पर कांग्रेस संगठन छिन्न भिन्न हो गया है। विषम भौगोलिक क्षेत्र वाले प्रत्येक क्षेत्र में गोदियाल का व्यक्तिगत रूप से जनता के बीच उपस्थित होना नामुमकिन है, ऐसे में गोदियाल के समक्ष संगठन की कमी अवश्य खलेगी। संसाधनों के पैरामीटर पर भी गोदियाल भाजपा के मुकाबले काफी कमजोर हैं।

■अनिल बलूनी: दिल्ली में पकड़, मजबूत संगठन व संसाधन बड़ी शक्ति■

देश के सबसे मजबूत सियासी दल में अनिल बलूनी बड़े ओहदे के साथ बीजेपी आलाकमान व केंद्रीय सत्ता के गलियारों में मजबूत पकड़ रखते हैं। राज्यसभा सांसद रहते हुए पौड़ी मुख्यालय सहित गढ़वाल संसदीय क्षेत्र में अनेक बड़ी योजनाओं में उन्होने अहम भूमिका निभाई है। साथ ही यह चर्चा भी उनके हक में जाती है कि यदि बलूनी निर्वाचित होते हैं और केंद्र में भाजपा फिर वापस लौटती है तो उन्हें यूनियन गवर्नमेंट में बड़ा ओहदा मिल सकता है, जिसका फायदा लोस क्षेत्र को मिल सकता है। वहीं उनके द्वारा पहाड़ व मातृभूमि के प्रति भावनात्मक लगाव प्रदर्शित करने हेतु इगास पर्व को अपने पैतृक गांव में मनाने के साथ “अपना वोट- अपने गांव” जैसे अभियान भी चलाये गए। उनकी सबसे बड़ी मजबूती भाजपा का बूथ लेबल तक का ठोस संगठन है, वहीं भाजपा के पास संसाधनों का कोई टोटा नहीं।
बलूनी हालांकि पौड़ी जनपद के ही मूल निवासी हैं किंतु पहाड़ में उनकी उपस्थिति, उनका जन संवाद गोदियाल के मुकाबले कहीं नहीं टिकता। यह पक्ष उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी गोदियाल के आगे उन्नीस साबित करता है। बलूनी गुजरात व दिल्ली में हाई लेबल की पॉलिटिक्स व स्ट्रेटजी के उस्ताद रहे हैं, लेकिन गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत उनकी आंशिक भौतिक उपस्थिति कोटद्वार व रामनगर तक ही सीमित रही है। वहीं पौड़ी जनपद में जन असन्तोष का सबब बन अंकिता हत्याकांड को लेकर उनकी चुप्पी भी उनके खाते में नेगेटिव मार्किंग करता है।

◆रोचक मुकाबले तक जा सकता है गढ़वाल का मैच◆

हालांकि मतदान को अभी लगभग एक माह शेष है, इस एक माह में हवाएं किस तरफ रुख करती हैं यह कहना अभी जल्दबाजी होगा। लेकिन यदि कांग्रेस का बचा खुचा संगठन समर्पण व तन्मयता से कार्य करता है तो मुकाबले को आखिरी ओवर तक ले जाया जा सकता है। संगठन की सक्रियता व प्रचार अभियान में तो भाजपा बढ़त ले ही चुकी है लेकिन आम वोटर को भी माइंडसेट की स्थिति तक पंहुचने में समय लगेगा। अब आने वाले 30 दिनों की मेहनत ही दोनों प्रत्याशियों की परफॉर्मेंस को तय करेगी। हालांकि कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले अधिक पसीना बहाने की दरकार है।

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