#उत्तराखण्ड

हैरानी: ..आखिर उत्तराखंड में कांग्रेस के महारथी क्यों बन रहे हैं रणछोड़..?

Share Now

अजय रावत अजेय
●मनीष खंडूरी तो रण शुरू होने से पहले सेना ही छोड़ बैठे
●यशपाल, प्रीतम के बाद हरीश रावत भी लगे मुकरने, गोदियाल भी अधिक उत्साहित नहीं
●ईडी ने उत्साहित हरक की उमंग में डाल दिया पानी

उत्तराखंड में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस पार्टी आंतरिक रूप से जबरदस्त उहापोह से ग्रसित हो गयी है। प्रथम पांत के तमाम नेता या तो चुनाव न लड़ने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं तो वहीं अन्य भी लोक सभा चुनाव के मैदान-ए-जंग में उतरने को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं हैं। 140 बरस पुरानी ऐसी पार्टी जिसकी जड़ें पहाड़ में दशकों तक अडिग रहीं, उसके नेताओं का यूं रणछोड़ बनना हैरान करता है।

वर्तमान नाजुक दौर में जब कांग्रेस की सेना न केवल कमजोर है बल्कि उसके कार्यकर्ताओं का मनोबल भी रसातल में है, इस दौर में हरीश रावत, प्रीतम सिंह, गणेश गोदियाल सरीखे महारथियों को स्वयं मोर्चे पर अगुवाई करने की दरकार थी किन्तु इन नेताओं की सियासी कायरता से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भी भगदड़ के हालात पैदा हो जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

हरीश रावत के बाबत कहा जा रहा है कि पूर्व में भले ही वह हरिद्वार के मैदान में मोर्चा संभालने को राजी थे , किन्तु अब खबर है कि वह भी इस मैदान-ए-जंग में अपने पुत्र को भेजने की बात कहने लगे हैं। कुमाऊं के पहाड़ से तराई के मैदान तक समान जनाधार रखने वाले दिग्गज यशपाल आर्य द्वारा जंग से दूर रहने का ऐलान हैरान करता है। नैनीताल व अल्मोड़ा सीट पर आर्य की मौजूदगी से भाजपा को अपना किला बचाने को निश्चित रूप से काफी मशक्कत करनी पड़ती, लेकिन यदि यशपाल आर्य अपनी इच्छा पर अडिग रहते हुए चुनाव में भाग नहीं लेते हैं तो यह कांग्रेस खेमे के लिए काफी नुकसानदेह साबित हो सकता है।

यदि प्रीतम सिंह की बात की जाए तो वह इस मर्तबा टेहरी गढ़वाल से कांग्रेस के स्वाभाविक दावेदार माने जाते रहे हैं, लेकिन खबरों पर यकीन करें तो वह भी इस बार जंग से दूर रहने का मन बना चुके हैं। ले दे के सिर्फ गणेश गोदियाल ही ऐसे दिग्गज शेष हैं जिन्होंने गढ़वाल सीट से चुनाव लड़ने अथवा न लड़ने को लेकर कोई बयान नहीं दिया है। यदि इस सीट पर उनके नाम पर सहमति बनती है तो निश्चित रूप से गढ़वाल-पौड़ी के रणक्षेत्र में कांग्रेस के सेनापति गणेश गोदियाल ही होंगे।

वहीं, 2019 में गढ़वाल-पौड़ी से कांग्रेस खेमे के सेनापति रहे मनीष खंडूरी ने तो युद्ध से ऐन पहले ही सेना को बाई-बाई कर डाला, अतः अब उनकी चर्चा करना कांग्रेस के लिए निरर्थक है।

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी बिडम्बना यह रही कि उनके खेमें के सबसे विवादास्पद किन्तु धाकड़ लड़ाके हरक सिंह रावत को प्रवर्तन निदेशालय ने अपनी जकड़ में ले लिया। एकमात्र हरक सिंह ही ऐसे दिग्गज थे जो शिद्दत से हरिद्वार के मोर्चे पर कांग्रेस की सेना का नेतृत्व करने की दावेदारी कर रहे थे।

बहरहाल, यह तय नहीं है कि यह तमाम दिग्गज रणभूमि में उतरेंगे अथवा नहीं, किन्तु इन दिग्गजों की इस उदासीनता के चलते कांग्रेस के ग्राउंड ज़ीरो व ग्रास रूट के कार्यकर्ताओं में निराशा व्याप्त हो रही है । ऐसा नहीं है कि पहाड़ में कांग्रेस की जमीन पूरी तरह से स्खलित हो गयी हो, अभी भी इस पार्टी की विचारधारा की मजबूत कड़ियाँ पहाड़ी समाज में अखण्डित हैं। इसका हर ब्लॉक व ग्राम लेबल पर अभी भी काडर मौजूद है, बावजूद इसके दिग्गज महारथियों की इस तथाकथित कायरता के पीछे क्या कारण है, समझ से परे है।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *