#उत्तराखण्ड

सुरंग की डीपीआर व कार्यदायी कम्पनी के तजुर्बे पर ही सवाल

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अनिल बहुगुणा अनिल (हिम तुंग वाणी)

■डीपीआर पर ही उठने लगे सवाल

■क्या कार्यदायी संस्था को था टनल निर्माण का पर्याप्त अनुभव

■ मानकों के  अनुरूप आपातकालीन वैकल्पिक उपाय क्यो नही.?

सुरंग के निर्माण के दौरान मलबा गिरने और 40 मजदूरों के सुरंग में पिछले पाँच दिनों से फॅसे होने के बाद से इस टनल की डीपीआर भी संदेह के घेरे में आ गई है। बताया जा रहा है कि इस घटना के बाद इस राष्ट्रीय राज मार्ग में अब टनल के लिये नये सिरे से डीपीआर बनाई जायेगी।

एक वरिष्ठ भू वैज्ञानिक ने बताया कि सुरंग निर्माण करने वाली कंपनी की लापरवाही के कारण ये हादसा हुआ है। एक्सपर्ट टीम ने निरीक्षण के बाद कहा कि सॉफ्ट चट्टान की वजह से यह हालात पैदा हुए। इस बयान के बाद सुरंग के निर्माण में लगी कंपनी भी संदेह के घेरे में आ गई है। बताया तो ये भी जा रहा कि लगभग 4 किमी लंबाई की निर्माणाधीन टनल में पूर्व में भी मलबा गिर चुका है। लेकिन इसके बाद भी सुरक्षात्मक कदम नहीं उठाए गए।

नाम न लिखने की शर्त पर राज्य के एक वरिष्ठ भू वैज्ञानिक ने बताया कि डी पी आर में चट्टानों के वीक होने का उल्लेख भू वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। उन्होंने बताया कि वीक(शेयर पार्ट )का प्राइमरी ट्रीटमेंट पहले किया जाना चाहिए था, और परमानेंट ट्रीटमेंट के बाद ही मजदूरों को कार्य के लिए आगे भेजा जाना चाहिये था,लेकिन कार्यदायी संस्था द्वारा ये इसमें लापरवाही बरती और मजदूरों को परमानेंट ट्रीटमेंट के बजाय आगे काम करने के लिये भेज दिया गया। सूत्रों के मुताबिक सुरंग निर्माण का कार्य उन्ही कम्पनियों को दिया जा सकता है, जिसे इस कार्य का कम से कम 5 वर्ष का तजुर्बा हो। निर्माण में तय मानकों के मुताबिक मूल सुरंग के पैरालेल एक ट्यूब टनल भी बनाई जाती है जो किसी भी आपातकालीन परिस्थिति में श्रमिकों  को इवैकुएट करने में मददगार होती है।
रविवार को हुई दुर्घटना के बाद सुरंग के भविष्य पर भी सवाल खड़े हो गए है। अगर,एक्सपर्ट्स की रिपोर्ट के अनुसार निर्माणाधीन सुरंग के बनाने में इस तरह की लापरवाही बरती जा रही है तो ये भविष्य में भी जान माल के लिये भी ख़तरनाक है। उधर पर्यावरण विद भी हिमालयी क्षेत्र में मानकों के उल्लंघन का आरोप लगा चुके हैं।

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