विकास की बलि लेता सामाजिक उन्माद: आलेख-रतन सिंह असवाल

रतन सिंह असवाल ( इंटरनेशनल ट्रेवलर)
किसी भी प्रगतिशील राष्ट्र की पहचान उसकी गगनचुंबी इमारतों या उसकी अर्थव्यवस्था के आकार से ही नहीं, बल्कि उसके समाज में व्याप्त शांति और कानून के शासन से होती है। लेकिन हाल के वर्षों में भारत के विभिन्न हिस्सों से आने वाली धार्मिक उन्माद, मॉब लिंचिंग और नफरती भाषणों की खबरें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हम विकास के पथ पर आगे बढ़ रहे हैं या मध्ययुगीन बर्बरता की ओर लौट रहे हैं?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है। लेकिन जब भीड़ सड़कों पर न्याय करने लगे, तो यह सीधा प्रहार संविधान की प्रस्तावना में लिखे ‘बंधुत्व’ और ‘न्याय’ के वादे पर होता है। उच्चतम न्यायालय ने ‘तहसीन पूनावाला’ मामले में स्पष्ट कहा था कि “भीड़तंत्र को नई सामान्य स्थिति नहीं बनने दिया जा सकता।” अदालत की यह चेतावनी सरकारों के लिए एक आइना है, जो दर्शाती है कि कानून का इकबाल खत्म हो रहा है।
हम एक तरफ ‘विकसित भारत’ और 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का स्वप्न देख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सामाजिक अस्थिरता इस नींव को हिला रही है। दुनिया का कोई भी बड़ा निवेशक अपनी पूंजी उस देश में नहीं लगाना चाहता जहाँ सामाजिक तनाव और दंगों का अंदेशा हो। पर्यटन क्षेत्र, जो भारत की आय का एक प्रमुख स्रोत है, ऐसी घटनाओं से सबसे पहले प्रभावित होता है। विदेशी पर्यटक केवल स्मारकों को देखने नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और शांतिपूर्ण संस्कृति का अनुभव करने आते हैं।
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ यानी युवा शक्ति है। आज का युवा वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रहा है। यदि देश की अंतरराष्ट्रीय छवि एक ‘अहिष्णु राष्ट्र’ की बनती है, तो इसका सीधा असर विदेशों में हमारे युवाओं की स्वीकार्यता, उनकी शिक्षा और रोजगार के अवसरों पर पड़ेगा। कट्टरता की आग में झुलसा हुआ समाज कभी भी नवाचार और रचनात्मकता का केंद्र नहीं बन सकता।
लोकतंत्र में सरकार का सबसे बड़ा ‘राजधर्म’ है,भेदभाव रहित सुरक्षा। जब तक नफरत फैलाने वालों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति जमीन पर नहीं दिखेगी, तब तक सामाजिक सौहार्द केवल किताबों तक सीमित रहेगा। साथ ही, समाज के प्रबुद्ध वर्ग और धार्मिक संगठनों का मौन भी उतना ही घातक है। जैसा कि कहा गया है, “बुराई की जीत के लिए बस इतना काफी है कि अच्छे लोग कुछ न करें।”
देश किसी एक विचारधारा से नहीं, बल्कि संविधान और विवेक से चलता है। आज समय की मांग है कि हम राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर उठकर राष्ट्र के भविष्य के बारे में सोचें। यदि उन्माद की इस राजनीति को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो इसकी भारी कीमत हमारी आने वाली पीढ़ियों को आर्थिक बदहाली और सामाजिक अलगाव के रूप में चुकानी होगी। विकास और उन्माद साथ-साथ नहीं चल सकते।





