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उत्तराखंड राज्य की रजतजयंती: अवसाद के पच्चीस वर्ष! आलेख: ग्रीनानंद

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-सुरेश नौटियाल ग्रीनानंद

आज 9 नवंबर को उत्तराखंड राज्य बने 25 वर्ष पूरे हो गये हैं. राजनीति के हिसाब से इस छोटी सी अवधि और जनता की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं के हिसाब से इस बड़ी अवधि का लेखा-जोखा आम जनता अपने हिसाब से कर तो रही है पर राजनीतिक गणित के फेर में आने के परिणामस्वरूप वह बार-बार गच्चा खा जाती है.

पत्रकार होने के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक, पारिस्थितिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता के तौर पर सोचते हुए हमें कतई और कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि अपना उत्तराखंड राज्य गत 25 वर्ष में कहीं बेहतरी की ओर बढ़ा है.

जो विकास दिखाया जाता है या वर्णित किया जाता है, वह कास्मेटिक है. केवल विज्ञापनों में है. अनावश्यक चारधाम चौड़ी सड़क में है. देश की सुरक्षा के नाम पर पूंजीपतियों के लाभ के लिए बनाई जा रही ऋषिकेश-कर्णप्रयाग जैसी रेल लाइन में है. जंगलों को काटकर बनाये जा रहे पंचतारा होटलों और रिसोर्टों में है. और सबसे बढ़कर, सरकार से लेकर मुख्यमंत्री और मंत्रियों की झूठी छवि बनाने के लिए अरबों रुपये खर्च किये जा रहे हैं. आप यह सब जानते हैं.

गोएबल्स सिंड्रोम (Goebbels Syndrome) के बारे में बताना चाहूंगा. यह सिंड्रोम एक मनोवैज्ञानिक-राजनीतिक शब्द है, जो नाज़ी जर्मनी के प्रचार मंत्री जोसेफ गोएबल्स (Joseph Goebbels) के नाम पर आधारित है। इसका अर्थ है: जब कोई व्यक्ति, संस्था या सरकार झूठ को बार-बार और आत्मविश्वास के साथ दोहराती है तो वह अंततः सच जैसा लगने लगता है, तो इस प्रवृत्ति को “गोएबल्स सिंड्रोम” कहा जाता है। जोसेफ गोएबल्स ने कहा था: “यदि आप एक झूठ को बार-बार दोहराते हैं, तो लोग अंततः उसे सच मानने लगते हैं।”

आज उत्तराखंड में यही हो रहा है. झूठ को जानबूझकर प्रचार के माध्यम से फैलाया जा रहा है. जनता की भावनाओं और विश्वासों को अपने ढंग से नियंत्रित करने का प्रयास किया जा रहा है. मीडिया और अन्य संचार माध्यमों जैसे सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर झूठ को सत्य के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. विरोधी दलों के लोकतान्त्रिक विचारों को दबाने और बदनाम करने के प्रयास हो रहे हैं. चाटुकारों के अलावा पत्रकारों और कलाकारों तक का दुरुपयोग किया जा रहा है.

हमारे स्वास्थ्य मंत्री जब कहते हैं कि उत्तराखंड में पहले रोगी डॉक्टर को ढूंढते थे पर अब डॉक्टर्स सरप्लस हो गए हैं तो उन्हें रोगी ढूंढने पड़ रहे हैं, तो यह सीधे-सीधे गोएबल्स सिंड्रोम है, जिसका वह शिकार हो गए हैं. कहने का अर्थ है कि जब कोई राजनीतिक दल या नेता किसी झूठे दावे को बार-बार दोहराता है तो जनता उसे सच मानने लगती है.

वस्तुत:, राज्य में जिस पार्टी की सरकार है, उसकी विचारधारा की जड़ें वास्तव में झूठ और फरेब में गड़ी हैं.

कहना चाहूंगा कि ऊपर की परत उतार दें तो नीचे सबकुछ वैसा ही है जैसा 25 वर्ष पहले या उत्तराखंड राज्य बनने से पहले था.

अनेक सवाल आज अपनी गरिमा, अपनी आभा और अपनी तपिश खो चुके हैं, यद्यपि जिंदा समाजों में ऐसा अपेक्षित नहीं होता है. समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया कहा करते थे कि जिन्दा कौमें पांच साल इंतज़ार नहीं करतीं, और हम उत्तराखंडी 25 वर्ष से प्रतीक्षा ही कर रहे हैं!

आपको याद होगा कि वर्ष 2002 में उत्तराखंड में 70 सीटों पर पहला विधानसभा चुनाव हुआ और राज्य की जनता ने कांग्रेस पार्टी को सत्ता सौंप दी यद्यपि इस पार्टी ने केंद्र में नरसिम्हाराव की सरकार के दौरान उत्तराखंड राज्य आंदोलन को हतोत्साहित करने के पूरे प्रयास किये.

अब तो यह बहस भी बेमानी हो गयी है कि राज्य की अंतरिम राजधानी में अंतरिम सरकार का अंतरिम मुख्यमंत्री ऐसे व्यक्ति को क्यों बनाया गया था जिसकी भूमिका उत्तराखंड राज्य आंदोलन में अंतरिम तक नहीं थी.

वर्ष 2007 में जनता ने फिर और एक गलती की. नागनाथ का साथ छोड़कर सांपनाथ को पकड़ लिया और आज तक इन दलों की मोहमाया से मुक्त नहीं हो पाई है.

स्वयं को बड़े और राष्ट्रीय मानने वाले राजनीतिक दलों की तो इसी बात में चांदी है कि जनता बड़े सवाल उछालने के बजाय चुपचाप उन्हीं में से एक को बारी-बारी से सत्ता सौंपती रहे. अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपनों को ही दे! हां, अंधी जनता को कांग्रेस और भाजपा दल ही अपने लगते हैं और फिर-फिर वह रेवड़ी इन्हीं दो पार्टियों में बांट देती है. शेष अर्थात क्षेत्रीय दलों के लिए अंगूठा!

दोहराना चाहते हैं कि राज्य बनने से पहले और इसके तुरंत बाद जो प्रश्न मुंहबाये खड़े थे वे आज भी जस के तस हैं. उनका समाधान दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा है क्योंकि समाधान की दिशा में सत्तारूढ़ राजनीतिक नेतृत्व से लेकर नौकरशाह तक कोई भी कुछ व्यावहारिक और सार्थक करता दिखायी नहीं दे रहा है.

बड़े राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों के लिए राजनीति करना मोटी आय वाला आसान व्यवसाय हो गया है और नौकरशाहों का एक बड़ा वर्ग पहले से ही खून चूसने में लगा है. अब इसमें हर प्रकार के ठेकेदार भी शामिल हो गए हैं. राजनीतिक दलाली करने वाले ठेकेदार सबसे ज्यादा खतरनाक हैं. हाकम जैसे लोग इसी वर्ग में आते हैं. नेता लोग स्वयं रेता-बजरी और वन माफिया बन गए हैं. हरिद्वार से सांसद त्रिवेंद्र रावत यह मामला संसद में उठा चुके हैं.

सवाल है कि क्या राज्य में आज तक की किसी सरकार ने पूर्व और वर्तमान नौकरशाहों और नेताओं की संपत्तियों-परिसंपत्तियों का सोशल ऑडिट करने की आवश्यकता समझी और क्या यह पता लगाने का प्रयास किया कि उनकी पार्टियों के नेता और कार्यकर्त्ता कैसे हाई-प्रोफाइल जीवन जीते हैं?

हमसे पूछें तो बहुत स्पष्ट तौर पर कहना चाहेंगे कि लोकतंत्र में न तो हमें अपने जिलों में कलेक्टर चाहिए और न ही पुलिस कप्तान. विकसित और लोकतान्त्रिक देशों में कलेक्टर और पुलिस कप्तान की उपनिवेशवादी व्यवस्था समाप्त की जा चुकी है. हमारा सवाल है कि त्रिस्तरीय पंचायती चुनावों में जो जनप्रतिनिधि जीतकर आते हैं वे क्या सजावट के लिए हैं? उत्तर है: इन जनप्रतिनिधियों के नेतृत्व में कलेक्टर और पुलिस कप्तान जैसे लोग काम करें और प्रशासन को जनता के प्रति जवाबदेह बनाएं.

यूनिवर्सल सिविल कोड (यूसीसी) तो उत्तराखंड सरकार ने आनन्-फानन में लागू कर दिया पर इस बारे में नहीं सोचा कि किस प्रकार से लोकतंत्र को आम नागरिक के द्वार पर ले जाया जा सकता है.

त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था को अप्रभावी बने रहने दिया जा रहा है. इसका एक कारण हमारी चुनाव प्रणाली भी है. फर्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम पुराना पड़ चूका है. इसे बदलने की आवश्यकता है.

कुल मिलाकर, आम आदमी और हर गांव-देहात की वही हालत है जो राज्य बनने से पहले थी. वास्तव में समाज का एक बड़ा वर्ग तो यह सोचने लगा है कि राज्य न बनता तो बेहतर स्थिति होती.

यह वर्ग घोर निराशा में ऐसा सोच रहा है और इसलिए भी कि उसके आसपास के माहौल में कोई बदलाव नहीं है.

उत्तर प्रदेश में रहते हुए जनता को शासन-प्रशासन की जिस उपेक्षा और उदासीनता से आये दिन साक्षात्कार होता था उसमें कोई परिवर्तन नहीं आया है. जितना दूर पहले लखनऊ था, उससे भी दूर और महंगा देहरादून हो गया है.

एक वाक्य में कहें तो भावनात्मक रूप से देहरादून उत्तर प्रदेश के लखनऊ से भी दूर है. पड़ोसी राज्यों के लोगों ने उत्तराखंड के संसाधनों पर कब्जे कर लिए हैं. कोई ऐसा बड़ा मार्ग नहीं रह गया है जिसके आस-पास की जमीनें दिल्ली-मुजफ्फरनगर से लेकर लुधियाना और न जाने कहां-कहां तक के लोगों ने खरीद ली हैं.

सच में उत्तराखंड राज्य एक गिरवी राज्य है.

जमीनों पर बाहरी लोगों के साथ-साथ अपने-आप को साधु, संत और स्वामी-बाबा कहने वालों के अंधाधुंध कब्जे, सरकार पर विश्व बैंक से लेकर न जाने किस-किस का कर्ज, अपने पानी-अपने बांधों पर राज्य का अधिकार नहीं और न जाने क्या-क्या? कोई जब कुपूत साबित हो जाता है तो मां-बाप तक कहते हैं कि ऐसी औलाद से अच्छे तो बेऔलाद ही होते. यही भाव रह-रहकर खासकर उत्तराखंड की पर्वतीय जनता के मन में आता है.

यदि परिवर्तन दिखता है तो वह विधायकों की फौज, मंत्रियों और उनके कारिंदों की टोलियों और बड़ी पार्टी के कार्यकर्त्ताओं और उनपर आश्रित ठेकेदारों में दिखायी देता है. और बदलाव यह है कि पहले मारुति-800 गाड़ी में घूमने वाले लोग अब ऐसी बड़ी-बड़ी और लंबी-लंबी गाड़ियों के मालिक बन गए हैं कि आपको उनके नाम भी ज्ञात न हों. हाल ही में विधानसभा के सत्र में अनेक विधायकों ने इस बारे में विस्तार से तल्ख़ टिप्पणियां की हैं. हरिद्वार जिले से एक विधायक ने तो पहाड़ी विधायकों की पोल खोलने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी.

शराब माफिया पर पोषित जो लोग शोर मचाती मोटर साइकिलों में सवार होकर अपना रौबदाब जमाते थे वे अश्लील सी दिखने वाली बड़ी और भद्दी गाड़ियों के भीतर रंगरेलियां मनाते हुए पकड़े जाते हैं. अंकिता भंडारी जैसी बच्चियों के सपनों और जीवन को रौंदने वाले यही लोग हैं.

उत्तराखंड में कार्यरत नौकरशाह भी पहले की अपेक्षा ज्यादा स्वच्छंद और साधन संपन्न हुए हैं. उत्तर प्रदेश में जिन्हें कोई नहीं पूछता था, वे भी उत्तराखंड में आज रसूख और रौब-दाब रखते हैं. उनकी मैडमों ने तो जनता के हित के नाम पर तरह-तरह की संस्थाएं खोल ली हैं और अपनी सुविधाओं के लिए इन्हें कामधेनु की भांति उपयोग करती हैं.

आश्चर्य होता है कि हजारों संस्थाओं की उपस्थिति के बाद भी राज्य की स्थिति जस की तस क्यों बनी हुयी है. मंत्रियों, विधायकों और उनके निकट संबंधियों ने नामी-बेनामी तरीकों से कॉलेज और संस्थान खोल लिए हैं और अपनी आने वाली पीढ़ियों की रोजी-रोटी का पक्का बंदोबस्त कर लिया है. अनेक सांसदों का हाल भी यही है. पर, बेचारी जनता?

भ्रष्टाचार और उदासीन नौकरशाही की समस्या कितनी कोणीय है, किसी को मालूम नहीं. तिब्बत के चप्पे-चप्पे की खोज कर पहली बार वहां का नक्शा बनाने वाले पंडित नैन सिंह रावत जैसे अन्वेषक यदि आज जीवित होते तो वह भी इन कोणों का सही आकलन नहीं कर पाते.

भ्रष्टाचार और नौकरशाही उन दृष्टिहीन व्यक्तियों की तरह हैं जो हाथी को नहीं देख पाने की स्थिति में स्पर्श द्वारा अपने-अपने ढंग से हाथी को परिभाषित करते हैं. हाथी के पूरे आयामों का वर्णन किसी के पास नहीं है.

इस तरह की विशुद्ध व्यापारिक गहमागहमी में आम आदमी के हालात कतई नहीं बदले हैं.

खास तौर पर उत्तराखंड के पर्वतीय लोगों को आज भी अपनी रोजी-रोटी के जुगाड़ के लिए उतना ही संघर्ष करना पड़ता है जितना कि उत्तर प्रदेश में रहते हुए या देश की आजादी से पहले करना पड़ता था.

हां, सड़कें जरूर गांवों के ज्यादा नजदीक पहुंची हैं लेकिन इन सड़कों के रास्ते तमाम तरह की विकृतियां और भ्रष्टाचार के औजार भी गांवों तक पहुंचे हैं. भ्रष्टाचार के इन शस्त्रों ने समाज की रचनात्मक सक्रियता को ध्वस्त करने के प्रयास ज्यादा किये हैं. यही कारण है कि गांवों में विकास भले ही न पहुंचा हो लेकिन विकृतियां अवश्य पहुंच गयी हैं. इन विकृतियों ने बड़ी संख्या में लोगों को इतना अक्षम बना दिया है कि उन्हें अपने अधिकारों और अपेक्षाओं की चिंता ही नहीं है. मनरेगा जैसी व्यवस्था इन्हीं विकृतियों में से है.

लगता है कि सरकार को ऐसी ही स्थिति चाहिए ताकि जनता चुपचाप अपनी पीड़ा सहती रहे और चुप्पी साधे रहे.

नेतागण ऐसी स्थिति में अपने वाक्चातुर्य और प्रेस के एक वर्ग के साथ अच्छे संबंधों के चलते झूठी वाहवाही लूट रहे हैं. इस वाहवाही का फायदा वे अपने आप को सत्ता में बनाये और बचाये रखने में कर रहे हैं. मुख्यमंत्री तक अब धाकड़ कहलाना पसंद कर रहे हैं. लोकतंत्र का इससे बड़ा क्या मजाक होगा?

और जब तक कुछ पता चलता है, तब तक अगले चुनाव आ जाते हैं. और जुगाड़ यही रहता है कि देहरादून में कुछ न मिले तो दिल्ली में ही सही. अर्थात, जनता की सेवा नहीं, अपने-अपने स्वार्थों की पूर्ति का धंधा पूरे जोरों पर है. पूरी निर्ममता के साथ यह काम 25 वर्ष से चल रहा है. कांग्रेस और भाजपा में कोई अंतर नहीं रह गया है. ये पार्टियां एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. रूप कुछ भिन्न है पर आकार-प्रकार एक जैसा. यह बात क्या इस बात से साबित नहीं हो जाती कि इन पार्टियों के अनेक नेता दोनों पार्टियों में मंत्रित्व का सुख भोग चुके या भोग रहे हैं!

और क्षेत्रीय राजनीतिक दल समाज के वंचित वर्गों की तरह हाशिये पर धकेल दिए गए हैं. जनता को जागरूक करने का काम करने वाले ये क्षेत्रीय दल थकते दिखाई दे रहे हैं. जनता भी संघर्ष की राह पर चलने से बेहतर मनरेगा की राह को अधिक लाभकारी समझ रही है. संघर्ष के बारे में उसकी समझ कुंद होती जा रही है और धार भी पैनी नहीं रह गयी है.

आज इस बात की जरूरत अधिक महसूस की जा रही है कि लोग जागरूक हों और घिसी-पिटी पार्टियों के अलावा विकल्प की राजनीति के बारे में सोचें, लेकिन संभवत: उसका धैर्य डोल गया है. जनता जान चुकी है कि इन पार्टियों और उसका चोली-दामन का साथ है. वह जानती है कि जिन पार्टियों ने उनकी तस्वीर और तकदीर पिछले इतने वर्षों में नहीं बदली है उनसे अब और उम्मीद करने की जरूरत नहीं है.

छोटी और क्षेत्रीय दलों की आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज भी नहीं बन पा रही है. क्षेत्रीय पार्टियां समय-समय पर कुछ-कुछ करने का प्रयास करती हैं पर बड़ी पार्टियों के प्रताप और आभामंडल के होते उनके प्रयास जनता न तो दिखाई देते हैं और न ही मीडिया उन्हें जनता तक ले जाने के प्रयास करता है.

राज्य बनने के समय जो मुद्दे ज्वलंत थे उनसे आज भी आग निकल रही है. उत्तर प्रदेश के साथ परिसंपत्तियों के बटवारे और टिहरी विद्युत परियोजना में राज्य के हिस्से का मामला हो या हरिद्वार में स्थित उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग से अपने हिस्सा और अधिकार लेने का मामला हो — सबमें उत्तराखंड राज्य मुंह की खा चुका है.

जनता ने सोचा था कि योगीजी मूल रूप से उत्तराखंड के हैं, लिहाजा परिसंपत्तियों के बटवारे में उत्तराखंड के हितों का ध्यान भी रखेंगे पर ऐसा हुआ नहीं. उत्तराखंड के भीतर उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई विभाग इत्यादि की परिसंपत्तियों के बोर्ड उत्तराखंडी जनता को हरिद्वार जैसी जगह मुंह चिढ़ाते दिखाई देंगे पर यह सब देखकर चुभन कोई महसूस नहीं कर रहा.

सत्तापक्ष तो बेशर्मी से अपनी असफलता को सफलता के पैक में डालकर बेचने की कोशिश में है ही.

गैरसैंण में राजधानी का मुद्दा जस का तस है. भराड़ीसैंण में कुछ भवन खड़े कर यह भ्रम पैदा कर दिया गया है कि आज नहीं तो कल राज्य की राजधानी गैरसैंण क्षेत्र अवश्य पहुंचेगी. सरकारों को विकल्पधारी कर्मचारियों से ज्यादा चिंता दायित्वधारियों को लेकर है. राज्य के जल-जंगल-जमीन पर निजी कंपनियों के कब्जे जारी हैं. वीरपुर-लच्छी से लेकर पोखड़ा तक जिस बेशर्मी से जनता के अधिकार वाले प्राकृतिक संसाधन नौकरशाही के साथ सांठ-गांठ कर पूंजीपतियों को लुटाये गए, उसकी अनेक मिसालें हैं.

पनबिजली परियोजनाओं के लिए आवश्यक जन सुनवाई तक नहीं की जा रही है. इसका नवीनतम उदाहरण पंचेश्वर पनबिजली परियोजना का है. इसे लेकर जहां भी तथाकथित जनसुनवाई की गई, जनता और जागरूक लोगों को बोलने नहीं दिया गया. वरिष्ठ पत्रकार राजीवलोचन साह से लेकर उक्रांद के वरिष्ठ काशी सिंह ऐरी तक के साथ दुर्व्यवहार किया गया.

एक पत्रकार साथी ने बताया कि भक्तों की एक पार्टी ने ऊपर से आदेश दिए थे कि किसी भी स्थिति में जनसुनवाई पंचेश्वर बांध के पक्ष में करवाई जानी चाहिए. और ऐसा किया भी गया.

और पंचेश्वर ही क्यों, राज्य में अनेक पनविद्युत परियोजनाओं का विरोध समय-समय पर होता रहा और तब-तब सरकार दमन करती रही और प्रभावित जनता सहती रही. प्रभावितों के अलावा राज्य के अन्य लोगों को पोई पीड़ा नहीं.

उत्तराखंड विधानसभा में विपक्ष के उपनेता भुवन कापड़ी ने हाल में विधानसभा में स्पष्ट रूप से कहा कि पिछले पच्चीस वर्षों की उपलब्धियों का बखान तो खूब हो रहा है लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति बिल्कुल उलट है। पिछले पच्चीस वर्षों में हम उपलब्धियों और विकास के मामले में युवा नहीं हुए हैं, जैसा कि सत्ता पक्ष के विभिन्न वक्ताओं ने दावा किया है, बल्कि वास्तव में हम गले तक भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। अपने बयान को पुष्ट करने के लिए भुवन कापड़ी ने सदन में जोरदार ढंग से चौंकाने वाले खुलासे करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार की शुरुआत हमसे ही होती है, जब हमारे विधायक विकास निधि से भी नौकरशाहों द्वारा कथित तौर पर पंद्रह प्रतिशत कमीशन काट लिया जाता है।

पर क्या हार मान ली जाए? आवश्यकता तो इस बात की है कि उत्तराखंड की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को बदलने के लिए कमर कस ली जाए. निराशा हो जाने से काम चलने वाला है नहीं. आज 25 साल का घुप्प अंधेरा है तो क्या, कल सुनहरी सुबह की पौ तो फटेगी ही! आशा है क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियां राज्य को नयी सुबह की ओर अग्रसर होंगी.

अंत में एक विचारणीय प्रश्न! यदि युवाओं को रोजगार देने के बजाय शराब के ठेके घरों के पास लाने की चिंता मंत्रियों और सरकार को अधिक हो, तब वास्तव में राज्य का भविष्य क्या होगा? अवसाद, जो मुज़फ्फरनगर त्रासदी के बाद आरंभ हुआ और अनेक तथाकथित दैवीय आपदाओं के साथ भीषणतम हुआ, 25 वर्ष वर्ष पूरे होने के पश्चात भी क्या जारी रहेगा?

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