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सियासी प्रतिद्वंदिता से बढ़ रहे हैं उत्तराखंड में राजनीतिक अपराध: आलेख प्रयाग पांडे

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प्रयाग पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार

एक दौर वह भी था जब उत्तराखंड के निवासियों की सादगी, ईमानदारी, अहिंसा, सत्यनिष्ठा के कसीदे पढ़े जाते थे। अपराध मुक्त समाज के रूप में यहाँ की विश्व स्तरीय ख्याति थी,लेकिन आज जब अपना राज्य और अपनी ही सरकार है तो चुनावी अपराधों के साथ ही गंभीर अपराधों की बाढ़ सी आ गई है। एक दौर था, जिस क्षेत्र में आपराधिक गतिविधियों के नियंत्रण के लिए बिना वर्दी और अस्त्र – शस्त्र विहीन एक अदद पटवारी तैनात होते थे, उनमें से अधिकांश क्षेत्रों में अब अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस उच्च स्तरीय प्रशिक्षण प्राप्त रेगुलर पुलिस फोर्स की तैनाती हो गई है। बावजूद इसके पहाड़ी क्षेत्रों में आपराधिक घटनाएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। राजनीति में बढ़ता अपराधीकरण देवभूमि उत्तराखंड के लिए शुभ संकेत नहीं है। उत्तराखंड के निवासी स्वभाव से सत्य और अहिंसा के संवाहक माने जाते थे। इसी वजह से पहाड़ को अहिंसक, सत्यवादी और अपराध मुक्त समाज के रूप में जाना- पहचाना जाता था। उत्तराखंड में अवस्थित पौराणिक देवस्थानों, विश्व विख्यात तीर्थस्थलों, ऋषि- मुनियों की तपोभूमि, स्वास्थ्यवर्धक जलवायु और मनमोहक नजारों के अलावा यहाँ के बाशिंदों की संयमित जीवन पद्धति एवं शुद्ध आचरण से इस भू- भाग को ‘देवभूमि’ के रूप में ख्याति अर्जित हुई थी, जो अब खतरे में है।
उत्तराखंड के बाशिंदों का सत्य के प्रति आग्रह, भोलेपन और विशुद्ध आचरण के अंग्रेज भी कायल थे। यहाँ 1815 में ब्रिटिश हुकूमत कायम हुई। ब्रिटिश शासन काल में जॉर्ज विलियम ट्रेल कुमाऊँ के दूसरे कमिश्नर बने। कुमाऊँ के तत्कालीन कमिश्नर जॉर्ज विलियम ट्रेल ने 1816 में उत्तराखंड के निवासियों के बारे में लिखा था- ‘यहाँ के लोग ईमानदार, सीधे- साधे, अभाव और कष्टों में भी धैर्यवान, मेहमान नवाज, मजाकिया स्वभाव के खुले दिल वाले सौम्य वक्ता हैं।….. पहाड़ी लोगों की ईमानदारी के बारे में जितनी तारीफ़ की जाए, उतनी कम है। यहाँ हर तरह की संपत्ति बिना खो जाने के भय से खुले में रहती है।’
तत्कालीन कमिश्नर जॉर्ज विलियम ट्रेल उत्तराखंड के निवासियों की सत्यनिष्ठा और ईमानदारी से इतने प्रभावित थे कि वे मुकदमों की सुनवाई के दौरान पक्षकारों और गवाहों से शपथ लेने को नहीं कहते थे। ट्रेल ने 1818 में लिखा है- ‘पहाड़ के लोग धार्मिक प्रवृत्ति के हैं, शपथ के बारे में नहीं जानते। सच बोलने के लिए शपथ लेने की जरूरत नहीं समझते हैं। वे इतने सीधे- साधे और सत्य के प्रति प्रतिबद्ध हैं कि शपथ की औपचारिकता के बिना भी उनसे सच्चाई जानना आसान है। लिहाजा इनसे शपथ लेने की औपचारिकता करना बेमतलब है, इससे शपथ की गरिमा कम होती है।’
ब्रिटिश शासन काल में कुमाऊँ के ग्रामीण क्षेत्र अपराध मुक्त थे। कुमाऊँ के तत्कालीन कमिश्नर जॉर्ज विलियम ट्रेल की 1822 में लिखी टिप्पणी भी इस तथ्य की पुष्टि करती है। ट्रेल ने लिखा था- ‘ पिछले वर्ष केवल 66 आदमी अल्मोड़ा जेल में थे, जिनमें छह क़त्ल के मुजरिम थे, जो इतने बड़े जिले (तब वर्तमान देहरादून, हरिद्वार, टिहरी, रुद्रप्रयाग एवं उत्तरकाशी जिलों को छोड़कर शेष उत्तराखंड कुमाऊँ जिले का हिस्सा था।) के लिए कुछ भी नहीं है। चोरियां व डकैतियां पहाड़ की तलहटी (तराई- भाबर क्षेत्र) में होती हैं। पर ये देश (मैदानी क्षेत्रों ) के लोगों द्वारा की जाती हैं।’
उत्तराखंड के निवासियों के इसी भलमनसाहत के कारण अंग्रेजों ने यहाँ रेगुलर पुलिस व्यवस्था लागू नहीं की। ब्रिटिश हुक्मरानों का तर्क था कि पहाड़ में नियमित पुलिस की आवश्यकता नहीं है। पहाड़ के लोग बिना किसी आदेश के खुद ही अपराधियों को पकड़ लेते हैं। 1816 में तत्कालीन कुमाऊँ कमिश्नर ट्रेल ने लिखा- ‘इस (कुमाऊँ) प्रांत में अपराधों की संख्या कम होने से फौजदारी पुलिस की आवश्यकता नहीं है। कातिल (हत्यारे) को यहाँ कोई नहीं जानता। चोरी व डकैतियां बहुत ही कम होती हैं। अंग्रेजी सल्तनत के यहाँ पर कायम होने के समय से अब तक जेल में बारह से अधिक कैदी कभी नहीं हुए, जिनमें ज्यादातर मैदानों के रहने वाले हैं।’
यही वजह है कि अंग्रेजों ने यहाँ पटवारी- पुलिसिंग की नायाब व्यवस्था लागू की। बिना औपचारिक वर्दी वाले निःशस्त्र पटवारी को पुलिस के थानेदार के समकक्ष अधिकार प्रदान किए। तब बिना वर्दी के निःशस्त्र पटवारी अकेले कम से कम पाँच दर्जन से अधिक गाँवों की कानून- व्यवस्था संभालते थे। इसके बावजूद पहाड़ी क्षेत्रों में अपराधों की संख्या न्यूनतम थी।
आज उसी उत्तराखंड में हमारे सत्यवादी पुरखों द्वारा स्थापित उच्चतम सामाजिक मूल्यों को रसातल में पहुँचाया जा रहा है। अब उत्तराखंड के दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्र भी अपराधों से निरापद नहीं रहे। उत्तराखंड की शांत वादियों में अपराधों की गतिविधियां बढ़ने के पीछे एक वजह येनकेन प्रकारेण वोट बटोरने की हवस एवं व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता को माना जा रहा है। सत्तालोलुपता एवं व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा से पहाड़ में अपराधों का ग्राफ बढ़ा है। पिछले दिनों उत्तराखंड में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव इसके जीवंत उदाहरण हैं। पंचायतों के चुनाव के दौरान नैनीताल जिले सहित अन्य स्थानों में घटित कुछेक अप्रिय घटनाओं ने उत्तराखंड की छवि को जबरदस्त आघात पहुँचाया है।

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