देवभूमि की सियासत में अपराध की दखल: आलेख-रतन सिंह असवाल
●रतन सिंह असवाल● (प्रबंध संपादक)
★उत्तराखंड में युवा राजनीति और अपराध विषय पर त्वरित टिप्पणी★
उत्तराखण्ड को देवभूमि और वीरभूमि से जाना जाता रहा है। इसकी माटी और थाती में लोकसंस्कृति की सादगी, सैन्य परंपरा की शौर्यगाथाएँ और ईमानदारी की मिसालें नज़ीर की तरह देखी और दी जाती रही है। लेकिन आज इस नवोदित हिमालयी राज्य की राजनीतिक पृष्ठभूमि में जिस तरह से अपराधी मानसिकता का अतिक्रमण हुआ है, वह न केवल राज्य की सामाजिक संरचना को खोखला कर रहा है बल्कि इसकी वैश्विक पहचान पर भी चोट कर रहा है और संदेह अलग से।
पिछले एक दशक में उत्तराखण्ड की राजनीति में कई ऐसे मामले हुए जिनमें जनप्रतिनिधियों, उनके परिवारजनों और सक्रिय कार्यकर्ताओं पर हत्या, दुराचार, भूमि कब्ज़ा, अवैध खनन,छीनाझपटी और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोप लगे हैं । वहीं दूसरी ओर चुनावी राजनीति में अथाह पैसे और मसल्स पवार का वर्चस्व बढ़ने से साफ-सुथरे जनप्रतिनिधि हाशिये पर चले गए, और आपराधिक प्रवृत्ति के लोग दल-बदल और सत्ता-प्रभाव के जरिए न केवल संरक्षित हो रहे हैं बल्कि वर्तमान राजनीतिक ब्यवस्था में जरूरी हो गए है।
सांस्कृतिक और सामाजिक और सामरिक महत्व वाला उत्तराखण्ड भारी दुश्वारियों के बाद भी ईमानदारी और सादगी का हस्ताक्षर रहा, जिसकी मिसालें दी जाती रही। गाँवों से लेकर सैन्य पृष्ठभूमि तक इस क्षेत्र ने देश को अनुशासित और वीर सपूत दिए हैं। लेकिन जब राजनीति से जुड़े चेहरे आपराधिक,छद्म और लूटखसोट की घटनाओं में उलझते हैं तो इससे संपूर्ण समाज की छवि दागदार तो होती ही है, साथ ही न मिटने वाला वाक़िया भी बन जाता है, और ये ही कारण है कि लोकतंत्र पर यहाँ जनता का भरोसा कमजोर होता है और आम लोग राजनीति को अपराध और भ्रष्टाचार का पर्याय मानने लगते हैं।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्तराखण्ड को देश-विदेश में देवभूमि और आध्यात्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विशेष पहचान हमेशा ही मिलती रही है। लेकिन दुर्भाग्यवश छवि जब अपराध और भ्रष्टाचार से अट सी गई है। इसका असर पर्यटन, निवेश और सांस्कृतिक प्रतिष्ठा पर सीधा पड़ता है।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश जाता है कि, नया राज्य भी पुराने राजनीतिक रोगों को आगे ढोता जा रहा है,और विश्वसनीयता और सम्मान दोनों घटते हैं।
कारणों की पड़ताल करने पर कुछ महत्वपूर्ण विंदु सामने आते है । जैसे राजनीति में अपराधियों का संरक्षण और दलबदल की संस्कृति, चुनावी प्रक्रिया में पैसे और जातिगत समीकरणों का बढ़ता महत्व, युवा कार्यकर्ताओं में वैचारिक प्रशिक्षण की कमी, जिनमें सेवा-भावना की बजाय व्यक्तिगत लाभ की प्रवृत्ति का हावी होना, स्थानीय प्रशासनिक स्तर पर न्यायिक प्रक्रिया की धीमी रफ्तार और अपराध सिद्ध न होने तक “राजनीतिक संरक्षण” ।
उत्तराखण्ड की आत्मा उसकी सादगी, वीरता और संस्कृति में बसती है। अगर राजनीतिक व्यवस्था पर अपराध और भ्रष्टाचार हावी हो गया तो यह न केवल लोकतंत्र की नींव को हिला देगा बल्कि देवभूमि की उस वैश्विक पहचान को भी मिटा देगा जिस पर हर उत्तराखण्डवासी गर्व करता है। आज जरुरत है कि राजनीतिक नेतृत्व स्वयं को ईमानदारी और शुचिता के दायरे में रख कर भविष्य की पीढ़ियों को यह विश्वास दिलाए कि उत्तराखण्ड केवल पर्यटन और आस्था की भूमि नहीं, बल्कि सच्ची लोकतांत्रिक राजनीति की भी मिसाल भी है ।





