#पौड़ी

जैव विविधता दिवस विशेष: दावानल नियंत्रण हेतु डीएम की पहल ला रही रंग

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■22 मई को जैव विविधता दिवस पर विशेष■■

डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट डॉ चौहान की पहल पर संवेदनशील अदवाणी अनुभाग में वन बंधु समिति का गठन

 अजय रावत अजेय

विश्वविख्यात जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क का 60 फीसदी वन क्षेत्र वाले जनपद गढ़वाल जनपद में अनूठी व व्यापक जैव विविधता देखने को मिलती है। राजाजी नेशनल पार्क का भी 40 प्रतिशत वन क्षेत्र इसी जनपद में है। वहीं कालागढ़ टाइगर रिज़र्व व सोना नदी वन्य जीव विहार भी इस जनपद को मिली नैसर्गिक नेमतों को दर्शाता है। 5329 वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले इस जनपद के 67 फीसद भूभाग घने अरण्यों से आच्छादित है। 

 गत वर्ष जिले में दावानल की बड़ी घटनाओं व मंडल मुख्यालय पौड़ी के निकट ही बेकाबू वनाग्नि के चलते बड़ी संख्या में वन व वन सम्पदाओं को नुकसान पहुंचा। अनेक मर्तबा तो स्वयम जिलाधिकारी डॉ आशीष चौहान को मोर्चे पर उतरना पड़ा। टेका-कांसखेत के खूबसूरत जंगल जब दावाग्नि से झुलसने लगे तो जिलाधिकारी ने प्रशासन व वन विभाग के कर्मियों का नेतृत्व करते हुए अनेक स्थानों पर दावानल को बुझाने के प्रयास भी किये। इसके पश्चात डीएम डॉ चौहान ने दावाग्नि नियंत्रण हेतु वन महकमें से कोऑर्डिनेशन कर व्यापक योजना बनाने के प्रयास शुरू किए। 

मुख्यालय के निकटवर्ती नागदेव रेंज के अदवाणी अनुभाग के बांज-बुरांश-काफल के संवेदनशील शील वनों को बचाने के लिए डीएम के निर्देश पर वन विभाग द्वारा अदवाणी वन बंधु समिति का गठन कर आसपास के ग्रामीणों को इस मुहिम से जोड़ा। स्थानीय ग्रामीणों को वनों से भावनात्मक रूप से जोड़ने की इसी पहल का नतीजा था कि अप्रैल माह में इस क्षेत्र में वनाग्नि की एक भी घटना सामने नहीं आयी। हालांकि अभी मौसम साथ दे रहा है किंतु डीएम के निर्देश पर किए गए होमवर्क इस वर्ष काफी कारगर साबित होता दिखाई दे रहा है। वहीं वनाग्नि के फैलाव में खलनायक माने जाने वाले पाइन नीडल यानी पिरूल को लेकर जिलाधिकारी ने जिस गंभीरता से प्रयास किया उसी के नतीजतन इस बार मण्डल मुख्यालय के नजदीक स्थित वनों में पिरूल की मात्रा गत वर्षों के मुकाबले काफी कम है, ज़ाहिर है यदि पिरूल नहीं होगा तो चीड़ के वनों में आग लगने की संभावनाएं लगभग शून्य हो जाती हैं। कलक्टर डॉ चौहान द्वारा अनेक बार स्वयं जंगलों से पिरूल कलेक्शन अभियान चलाया गया। वहीं एकत्र पिरूल को आजीविका से जोड़ने की खातिर जिले की हृदयस्थली सतपुली में एक सयंत्र की स्थापना भी की जा रही है जो पिरूल से बनने वाले उत्पादों के लिए बेसिक मटेरियल तैयार करेगा। 

 

■■■जिला सूचना कार्यालय , पौड़ी द्वारा जारी डिस्पैच■■■

गढ़वाल जिला, जो 5,329 वर्ग किलोमीटर में फैला है, अपनी प्राकृतिक सुंदरता और समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है। जिले का 67% हिस्सा घने जंगलों से ढका है, जिसमें जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क का 60%, राजाजी टाइगर रिज़र्व का 40% और कालागढ़ टाइगर रिज़र्व व सोनानदी वन्य जीव विहार शामिल हैं। यहां 212 बाघ, 414 तेंदुए, 1,083 हाथी और 550 से अधिक पक्षी प्रजातियां निवास करती हैं। लेकिन वनाग्नि इस जैव विविधता के लिए सबसे बड़ा खतरा बनी हुई है। इस चुनौती से निपटने के लिए पौड़ी प्रशासन और स्थानीय समुदाय ने मिलकर एक अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत किया है, जो देश के लिए प्रेरणा बन रहा है।

*शीतलाखेत मॉडल पर हो रहा काम*

पौड़ी जिले में अल्मोड़ा के शीतलाखेत मॉडल पर अमल किया जा रहा है। यह मॉडल वनाग्नि रोकथाम का एक आदर्श उदाहरण है। जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान के निर्देशन में इसके तहत अदवाणी वन बंधु समिति का गठन किया गया है । जिसमें 11,728 ग्रामीणों को जंगलों की रक्षा के लिए शपथ दिलायी गयी है। इस समिति का लक्ष्य लोगों में जंगलों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाना और आग की घटनाओं को रोकने में सक्रिय योगदान सुनिश्चित करना है।

*जनसहभागिता: बदलाव की सबसे बड़ी ताकत*

इस अभियान की रीढ़ रही जनसहभागिता। जिले की 394 ग्राम पंचायतों में वनाग्नि जागरूकता शपथ कार्यक्रम आयोजित किये गये। 157 स्कूलों में बच्चों को वनाग्नि के दुष्प्रभावों के बारे में बताया गया। आड़ा दिवस के जरिए किसानों को 31 मार्च के बाद खेतों में सूखी झाड़ियां और खरपतवार न जलाने के लिए प्रेरित किया गया। इसके साथ ही, 55 ग्राम स्तरीय वनाग्नि प्रबंधन समितियों का गठन किया गया, जो ग्राम प्रधानों की अध्यक्षता में 300-400 हेक्टेयर जंगल की निगरानी करती हैं। इन समितियों को प्रोत्साहन के लिए 30,000 रुपये की सहायता राशि भी दी गयी।

*तकनीक और सामुदायिक प्रयासों का तालमेल*

प्रभागीय वनाधिकारी स्वप्निल अनिरुद्ध ने बताया कि पौड़ी की अनूठी भौगोलिक संरचना और विविध पारिस्थितिकी तंत्र इसे वन्यजीवों के लिए सुरक्षित आश्रय बनाती है। वनाग्नि से निपटने के लिए पोलर सैटेलाइट तकनीक और 134 क्रू स्टेशनों पर 600 फायर वॉचर तैनात किये गये। इस तकनीकी-मानवीय समन्वय से आग की घटनाओं को तुरंत पहचानकर नियंत्रित करना संभव हुआ।

*पिरूल एकत्रीकरण: आग रोकथाम का प्रभावी कदम*

मुख्यमंत्री पिरूल एकत्रीकरण योजना ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 2024-25 में 19,000 क्विंटल चीड़ की सूखी पत्तियां (पिरूल) एकत्र की गयीं, जो जंगल में आग का प्रमुख कारण बनती हैं। चालू वर्ष 2025-26 में अब तक 4,000 क्विंटल पिरूल संग्रहीत किया जा चुका है, जिससे न केवल वनाग्नि की घटनाएं कम हुईं, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिला।

*समन्वित दृष्टिकोण से वन सम्पदा का संरक्षण*

प्रभागीय वनाधिकारी स्वप्निल अनिरुद्ध का कहना है कि तकनीक, मानव संसाधन और प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग इस पहल की सफलता की कुंजी है। जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान कहते हैं कि जागरूक समुदाय और सही मार्गदर्शन किसी भी प्राकृतिक आपदा को रोकने की दिशा में सबसे बड़ी ताकत है।

*अभियान से वनाग्नि की घटनाएं हुई कम*

इस अभियान का असर स्पष्ट दिखाई दे रहा है। उत्तराखंड वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष की 1,065 वनाग्नि घटनाओं की तुलना में इस वर्ष अब तक केवल 197 घटनाएं दर्ज की गयी हैं। पौड़ी का यह प्रयास न केवल जैव विविधता की रक्षा में मील का पत्थर साबित हो रहा है, बल्कि यह भी दिखाता है कि प्रशासन और जनता का साझा प्रयास पर्यावरण संरक्षण में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है।

वनों से लगे पार्कों से गन्दगी के साथ आग फैलाने वाला कूड़ा हटाते डीएम

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